Jeevan Darshan

Subtitle


 

 

 

 

   Welcome Everyone

 

 

 

 

 

अगर आप परमात्मा से मित्रता कर लें तो आप कभी अकेला महसूस नहीं करेंगे"
                      मिट जायेगा गुनाहों का एहसास दुनिया से दोस्तों
                   अगर आ जाये यकीं (भरोसा) के देख रहा है कोई

                 Soji Rao  Mobile No.- (0)9468099028

                             >JaanV<

 

प्रभु क्या है ?

हम जब प्रभु के बारे में सोचते हैं, तो प्रभु के जो गुण हैं- सचाई का, प्रेम का, मददगार होने का ये सब गुण हम अपने अन्दर लाना चाहते हैं। हम भी शुद्ध जीवन जीना चाहते हैं, चाहते हैं कि हर क्षण हमारी जिन्दगी ऐसी हो, जो खुशियों से भरपूर हो। लेकिन हम उस अवस्था में कैसे पहुँचें?
सोचना एक बात है और वहाँ पर पहुँचना दूसरी बात। बहुत सी बार इन्सान सोचता कुछ है, लेकिन करता कुछ और है। कई बार हालात ऐसे हो जाते हैं कि हम जो सोचते हैं, वैसा नहीं कर पाते। सब चाहते हैं कि अपनी जिन्दगी में से काम, क्रोध, लोभ, मोह और अंहकार को दूर कर दें। पर करें कैसे? ये सवाल हम सबके सामने आते हैं। क्रोध हमें बहुत जल्दी आता है। तो उस क्रोध को कैसे काबू में लाएँ?

बुद्ध की जिन्दगी का एक उदाहरण है। वे एक बार अपने शिष्यों के साथ बैठे हुए थे। एक नौजवान वहाँ संगत में पहुँचा और उन्हें बुरा-भला कहने लगा। बुद्ध के शिष्यों को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने चाहा कि उस नौजवान को उस जगह से दूर ले जाएँ। लेकिन बुद्ध ने उन्हें बिठा दिया और कहा कि इसे बोलने दो। वह बोलता गया, बोलता गया, बोलता गया; पाँच, दस, पन्द्रह मिनट बोलता गया और जब उसका गुबार निकल गया, तो बुद्ध ने बड़े प्रेम से उससे कहा कि जो तोहफा (गाली-गलौच का) तुम मेरे लिए लाए हो, यह मैं स्वीकार नहीं करता।
अगर गुस्से और क्रोध के साथ निपटना है, तो शान्त होकर ही निपटा जा सकता है। नहीं तो औरों की गर्मी, औरों की तेजी हमारे अन्दर भी गर्मी पैदा कर देती है। और हमारे अन्दर तनाव बढ़ता चला जाता है और छोटी-सी बात कई बार बहुत बड़ी हो जाती है।
महापुरुष समझाते चले आए हैं कि हम शान्त अवस्था में पहुँचें। लेकिन उस अवस्था में कैसे पहुँचें? इसके लिए हरेक धर्म में अन्तर्मुख होने को कहा जाता है। उसे भजन-सिमरन कहो, ध्यान टिकाना कहो, शान्त बैठकर प्रार्थना करना कहो -वह तरीका, जिसके द्वारा हम अपने आप को बाहर की दुनिया में नहीं, लेकिन अन्दर की दुनिया में ले जाते हैं।
जब हमारे कदम अन्दर की दुनिया में उठते हैं तो फिर हमारी जिन्दगी में एक बदलाव आना शुरू हो जाता है। हम बिना सोचे- समझे कोई प्रतिक्रिया नहीं करते। इन्सान जब बड़ी जल्दी में बगैर सोचे-समझे प्रतिक्रिया करता है, तो खराबी ही खराबी पैदा कर लेता है।

जिस किस्म का वातावरण हमारे आस-पास होता है, हम वैसे ही बन जाते हैं। अगर हम खुद शान्त रहेंगे, तो हमारे घर के, परिवार के लोग भी शान्त रहेंगे। हम लोग संतों - महापुरुषों की शरण में क्यों जाते हैं? उनके सत्संगों में क्यों जाते हैं? क्योंकि वहां पर जाकर हमें शान्ति मिलती हैं। वहाँ पर पहुँच कर हमारा ध्यान परमार्थ की ओर जाता है और इंसान, जिस ओर ध्यान देता है, वैसा ही बनने लगता है।
जब हम मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, गिरजे या किसी और धर्मस्थान पर जाते हैं, तो क्या होता है? हम अपने आप को पाक और साफ कर के जाते है, अपने आप को शुद्ध करके जाते हैं। हम ऐसा क्यों सोचते हैं? क्योंकि हमें मालूम है कि अगर प्रभु की ओर ध्यान देना है, तो हमें साफ होना है, शुद्ध होना है। लेकिन हम सिर्फ बाहर की सफाई करते हैं। शुद्धता तो अन्दर की होनी चाहिए। शरीर की नहीं, आत्मा की होनी चाहिए। जब तक इंसान अन्दर से शुद्ध नहीं होगा, तब तक उसे प्रभु के दर्शन नहीं हो पाते।

कबीर की लालटेन
कबीर जी रोज सत्संग किया करते थे,लोग आते और चले जाते। एक आदमी सत्संग खत्म हो गया फिर भी बैठा रहा। कबीर जी बोले क्या बात है वो इन्सान बोला मैं तो काफी दूर से आया हूँ मुझे आपसे कुछ पूछना है। क्या पूछना है? कबीर बोले। वो कहने लगा मैं गृहस्थी हूँ मेरा घर में झगड़ा होता रहता है। उसके बारे में जानना चाहता हूँ की झगड़ा कैसे दूर हो तो कबीर जी चुप रहे थोड़ी देर में कबीर जी ने अपनी पत्नी से कहा लालटेन जला केलाओ। कबीर की पत्नी लालटेन जला कर ले आई। कबीर जी के पास रख दी वो आदमी भी वही बैठा था सोच रहा था इतनी दोपहर है और लालटेन माँगा ली। खैर! मुझे इससे क्या। फिर कबीर जी बोले कुछ मीठा दे जाना। तों उनकी स्त्री नमकीन देकर चली गयी। उस आदमी ने फिर सोचा यह तो शायद पागलो का घर है मीठा के बदले नमकीन, दिन में लालटेन, वो आदमी बोला कबीर जी मैंचलता हूँ। मन में सोचने लगा कहाँफँस गया। कबीर जी समझ गए तो बोले आपको आपके झगड़े का हल मिला की नहीं। वो बोला क्या मिला? कुछ नहीं। कबीर जी ने कहा जैसे मैंने लालटेन मंगवाई घर वाली कह सकती थी की तुम क्या सठीया गए हो इतनी दोपहर में क्या करोगे। उसने सोचा होगा किसी काम के लियेलालटेन मंगवाई होगी ।मीठा मंगवाया तों नमकीन देकर चली गयी, हो सकता है घर में न हो पर में भी चुप रहा। इसमे तकरार क्या? तुम भी समझो तकरार करना छोड़ो। एक-दुसरे की बात को समझो । आपसी विश्वास बनाओ। वो आदमी हैरान था यह सब इन्होंने मेरे लिये किया। उसको समझ आने लगी गृहस्थी में तालमेल आपसी विश्वास बहुत जरुरी है। आदमी से गलती हो तो औरत संभले । औरत से गलती हो तो भी क्या है उसको भी क्या है गलती तो इन्सान से हो ही जाती है।
--- राधास्वामी जी !!

जीवन का उपयोग

महर्षि रमण के आश्रम के पास एक गांव में एक अध्यापक रहता था। रोज-रोज के पारिवारिक तनाव और कलह से ऊबकर उसने आत्महत्या करने का निर्णय किया। यह निर्णय करना उसके लिए आसान नहीं था, क्योंकि परिवार के भविष्य की भी उसे चिंता थी। ऊहापोह की इस स्थिति में वह महर्षि रमण के आश्रम में पहुंचा और उन्हें सारी बात बताकर उनकी राय पूछी। महर्षि उस समय आश्रवासियों के भोजन के लिए पत्तलें बना रहे थे। वे चुपचाप उसकी बात सुनते रहे। पत्तल बनाने में महर्षि के परिश्रम और तल्लीनता को देखकर अध्यापक को आश्चर्य हुआ। उसने पूछा, 'आप इतने परिश्रम से ये पत्तल बना रहे हैं, जबकि भोजन के उपरांत ये कूड़े में फेंक दी जाएंगी।' महर्षि मुस्कराते हुए बोले, 'आप ठीक कहते हैं, लेकिन किसी वस्तु का पूरा उपयोग हो जाने के बाद उसे फेंकना बुरा नहीं है। बुरा तो तब कहा जाएगा जब उसका उपयोग किए बिना अच्छी अवस्था में ही कोई फेंक दे। मेरे कहने का आशय तो आप समझ ही गए होंगे।' अध्यापक की समस्या का समाधान हो गया और वह दुखों से भागने की बजाय उनसे जूझने और संघर्ष करने का संकल्प लेकर वहां से रवाना हुआ।
--- राधास्वामी जी !!

आप हाथी नहीं इंसान हैं !
एक आदमी कहीं से गुजर रहा था, तभी उसने सड़क के किनारे बंधे हाथियों को देखा, और अचानक रुक गया. उसने देखा कि हाथियों के अगले पैर में एक रस्सी बंधी हुई है, उसे इस बात का बड़ा अचरज हुआ की हाथी जैसे विशालकाय जीव लोहे की जंजीरों की जगह बस एक छोटी सी रस्सी से बंधे हुए हैं!!! ये स्पष्ठ था कि हाथी जब चाहते तब अपने बंधन तोड़ कर कहीं भी जा सकते थे, पर किसी वजह से वो ऐसा नहीं कर रहे थे.उसने पास खड़े महावत से पूछा कि भला ये हाथी किस प्रकार इतनी शांति से खड़े हैं और भागने का प्रयास नही कर रहे हैं ? तब महावत ने कहा, ” इन हाथियों को छोटे पर से ही इन रस्सियों से बाँधा जाता है, उस समय इनके पास इतनी शक्ति नहीं होती की इस बंधन को तोड़ सकें. बार-बार प्रयास करने पर भी रस्सी ना तोड़ पाने के कारण उन्हें धीरे-धीरे यकीन होता जाता है कि वो इन रस्सियों नहीं तोड़ सकते,और बड़े होने पर भी उनका ये यकीन बना रहता है, इसलिए वो कभी इसे तोड़ने का प्रयास ही नहीं करते.” आदमी आश्चर्य में पड़ गया कि ये ताकतवर जानवर सिर्फ इसलिए अपना बंधन नहीं तोड़ सकते क्योंकि वो इस बात में यकीन करते हैं!! इन हाथियों की तरह ही हममें से कितने लोग सिर्फ पहले मिली असफलता के कारण ये मान बैठते हैं कि अब हमसे ये काम हो ही नहीं सकता और अपनी ही बनायीं हुई मानसिक जंजीरों में जकड़े-जकड़े पूरा जीवन गुजार देते हैं. याद रखिये असफलता जीवन का एक हिस्सा है ,और निरंतर प्रयास करने से ही सफलता मिलती है. यदि आप भी ऐसे किसी बंधन में बंधें हैं जो आपको अपने सपने सच करने से रोक रहा है तो उसे तोड़ डालिए….. आप हाथी नहीं इंसान हैं.
--- राधास्वामी जी !!

सफलता का रहस्य
एक बार एक नौजवान लड़के ने सुकरात से पूछा कि सफलता का रहस्य क्या  है?
सुकरात ने उस लड़के से कहा कि तुम कल मुझे नदी के किनारे मिलो.वो मिले. फिर सुकरात ने नौजवान से उनके साथ नदी की तरफ बढ़ने को कहा.और जब आगे बढ़ते-बढ़ते पानी गले तक पहुँच गया, तभी अचानक सुकरात ने उस लड़के का सर पकड़ के पानी में डुबो दिया. लड़का बाहर निकलने के लिए संघर्ष करने लगा , लेकिन सुकरात ताकतवर थे और उसे तब तक डुबोये रखे जब तक की वो नीला नहीं पड़ने लगा. फिर सुकरात ने उसका सर पानी से बाहर निकाल दिया और बाहर निकलते ही जो चीज उस लड़के ने सबसे पहले की वो थी हाँफते-हाँफते तेजी से सांस लेना. सुकरात ने पूछा ,” जब तुम वहाँ थे तो तुम सबसे ज्यादा क्या चाहते थे?”
लड़के ने उत्तर दिया,”सांस लेना” सुकरात ने कहा,” यही सफलता का रहस्य है. जब तुम सफलता को उतनी ही बुरी तरह से चाहोगे जितना की तुम सांस लेना  चाहते थे  तो वो तुम्हे मिल जाएगी” इसके आलावा और कोई रहस्य नहीं है.
--- राधास्वामी जी !!

बोले हुए शब्द वापस नहीं आते
एक बार एक किसान ने अपने पडोसी को भला बुरा कह दिया, पर जब बाद में उसे अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह एक संत के पास गया.उसने संत से अपने शब्द वापस लेने का उपाय पूछा. संत ने किसान से कहा , ” तुम खूब सारे पंख इकठ्ठा कर लो , और उन्हें शहर  के बीचो-बीच जाकर रख दो .” किसान ने ऐसा ही किया और फिर संत के पास पहुंच गया. तब संत ने कहा , ” अब जाओ और उन पंखों को इकठ्ठा कर के वापस ले आओ” किसान वापस गया पर तब  तक सारे पंख हवा से इधर-उधर उड़ चुके थे. और किसान खाली हाथ संत के पास पहुंचा. तब संत ने उससे कहा कि ठीक ऐसा ही तुम्हारे द्वारा कहे गए शब्दों के साथ होता है,तुम आसानी से इन्हें अपने मुख से निकाल तो सकते हो पर चाह कर भी वापस नहीं ले सकते. इस कहानी से क्या सीख मिलती है:
    कुछ कड़वा बोलने से पहले ये याद रखें कि भला-बुरा कहने के बाद कुछ भी कर के अपने शब्द वापस नहीं लिए जा सकते. हाँ, आप उस व्यक्ति से जाकर क्षमा ज़रूर मांग सकते हैं, और मांगनी भी चाहिए, पर human nature कुछ ऐसा होता है की कुछ भी कर लीजिये इंसान कहीं ना कहीं hurt हो ही जाता है. जब आप किसी को बुरा कहते हैं तो वह उसे कष्ट पहुंचाने के लिए होता है पर बाद में वो आप ही को अधिक कष्ट देता है. खुद को कष्ट देने से क्या लाभ, इससे अच्छा तो है की चुप रहा जाए.
--- राधास्वामी जी !!

बाड़े की कील
बहुत समय पहले की बात है, एक गाँव में एक लड़का रहता था. वह बहुत ही गुस्सैल था, छोटी-छोटी बात पर अपना आप खो बैठता और लोगों को भला-बुरा कह देता. उसकी इस आदत से परेशान होकर एक दिन उसके पिता ने उसे कीलों से भरा हुआ एक थैला दिया और कहा कि , ” अब जब भी तुम्हे गुस्सा आये तो तुम इस थैले में से एक कील निकालना और बाड़े में ठोक देना.” पहले दिन उस लड़के को चालीस बार गुस्सा किया और इतनी ही कीलें बाड़े में ठोंक दी.पर  धीरे-धीरे कीलों  की संख्या घटने लगी,उसे लगने लगा की कीलें ठोंकने में इतनी मेहनत करने से अच्छा है कि अपने क्रोध पर काबू किया जाए और अगले कुछ हफ्तों में उसने अपने गुस्से पर बहुत हद्द तक  काबू करना सीख लिया. और फिर एक दिन ऐसा आया कि उस लड़के ने पूरे दिन में एक बार भी अपना temper नहीं loose किया. जब उसने अपने पिता को ये बात बताई तो उन्होंने ने फिर उसे एक काम दे दिया, उन्होंने कहा कि ,” अब हर उस दिन जिस दिन तुम एक बार भी गुस्सा ना करो इस बाड़े से एक कील निकाल निकाल देना.” लड़के ने ऐसा ही किया, और बहुत समय बाद वो दिन भी आ गया जब लड़के ने बाड़े में लगी आखिरी कील भी निकाल दी, और अपने पिता को ख़ुशी से ये बात बतायी. तब पिताजी उसका हाथ पकड़कर उस बाड़े के पास ले गए, और बोले, ” बेटे तुमने बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन क्या तुम बाड़े में हुए छेदों को देख पा रहे हो. अब वो बाड़ा कभी भी वैसा नहीं बन सकता जैसा वो पहले था.जब तुम क्रोध में कुछ कहते हो तो वो शब्द भी इसी तरह सामने वाले व्यक्ति पर गहरे घाव छोड़ जाते हैं.” इसलिए अगली बार अपना temper loose करने से पहले सोचिये कि क्या आप भी उस बाड़े में और कीलें ठोकना चाहते हैं !!!
--- राधास्वामी जी !!

ग्लास को नीचे रख दीजिये
एक प्रोफ़ेसर ने अपने हाथ में पानी से भरा एक glass पकड़ते  हुए class शुरू की . उन्होंने उसे ऊपर उठा कर सभी students को दिखाया और पूछा , ” आपके हिसाब से glass का वज़न कितना होगा?” ’50gm….100gm…125gm’…छात्रों ने उत्तर दिया. ” जब तक मैं इसका वज़न ना कर लूँ  मुझे इसका सही वज़न नहीं बता सकता”. प्रोफ़ेसर ने कहा. ” पर मेरा सवाल है: यदि मैं इस ग्लास को थोड़ी देर तक  इसी तरह उठा कर पकडे रहूँ तो क्या होगा ?” ‘कुछ नहीं’ …छात्रों ने कहा. ‘अच्छा , अगर मैं इसे मैं इसी तरह एक घंटे तक उठाये रहूँ तो क्या होगा ?” , प्रोफ़ेसर ने पूछा. ‘आपका हाथ दर्द होने लगेगा’, एक छात्र ने कहा. ” तुम सही हो, अच्छा अगर मैं इसे इसी तरह पूरे दिन उठाये रहूँ तो का होगा?” ” आपका हाथ सुन्न हो सकता है, आपके muscle में भारी तनाव आ सकता है , लकवा मार सकता है और पक्का आपको hospital जाना पड़ सकता है”….किसी छात्र ने कहा, और बाकी सभी हंस पड़े… “बहुत अच्छा , पर क्या इस दौरान glass का वज़न बदला?” प्रोफ़ेसर ने पूछा. उत्तर आया ..”नहीं” ” तब भला हाथ में दर्द और मांशपेशियों में तनाव क्यों आया?” Students अचरज में पड़ गए. फिर प्रोफ़ेसर ने पूछा ” अब दर्द से निजात पाने के लिए मैं क्या करूँ? ” ग्लास को नीचे रख दीजिये! एक छात्र ने कहा. ” बिलकुल सही!” प्रोफ़ेसर ने कहा. Life की problems भी कुछ इसी तरह होती हैं. इन्हें कुछ देर तक अपने दिमाग में रखिये और लगेगा की सब कुछ ठीक है.उनके बारे में ज्यदा देर सोचिये और आपको पीड़ा होने लगेगी.और इन्हें और भी देर तक अपने दिमाग में रखिये और ये आपको paralyze करने लगेंगी. और आप कुछ नहीं कर पायेंगे. अपने जीवन में आने वाली चुनातियों और समस्याओं के बारे में सोचना ज़रूरी है, पर उससे भी ज्यादा ज़रूरी है दिन के अंत में सोने जाने से पहले उन्हें नीचे रखना.इस तरह से, आप stressed नहीं रहेंगे, आप हर रोज़ मजबूती और ताजगी के साथ उठेंगे और सामने आने वाली किसी भी चुनौती का सामना कर सकेंगे.
--- राधास्वामी जी !!

ज़िन्दगी के कंकड़ पत्थर और रेत.
Philosophy के एक professor ने कुछ चीजों के साथ class में प्रवेश किया. जब class शुरू हुई तो उन्होंने एक बड़ा सा खाली शीशे का जार लिया और उसमे पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़े भरने लगे. फिर उन्होंने students से पूछा कि क्या जार भर गया है ? और सभी ने कहा “हाँ”. तब प्रोफ़ेसर ने छोटे-छोटे कंकडों से भरा एक box लिया और उन्हें जार में भरने लगे. जार को थोडा हिलाने पर ये कंकड़ पत्थरों के बीच settle हो गए. एक बार फिर उन्होंने छात्रों से पूछा कि क्या जार भर गया है?  और सभी ने हाँ में उत्तर दिया. तभी professor ने एक sand box निकाला और उसमे भरी रेत को जार में डालने लगे. रेत ने बची-खुची जगह भी भर दी. और एक बार फिर उन्होंने पूछा कि क्या जार भर गया है? और सभी ने एक साथ उत्तर दिया , ” हाँ” फिर professor ने समझाना शुरू किया, ” मैं चाहता हूँ कि आप इस बात को समझें कि ये जार आपकी life को represent करता है. बड़े-बड़े पत्थर आपके जीवन की ज़रूरी चीजें हैं- आपकी family,आपका partner,आपकी health, आपके बच्चे – ऐसी चीजें कि अगर आपकी बाकी सारी चीजें खो भी जाएँ और सिर्फ ये रहे तो भी आपकी ज़िन्दगी पूर्ण रहेगी. ये कंकड़ कुछ अन्य चीजें हैं जो matter करती हैं- जैसे कि आपकी job, आपका घर, इत्यादि. और ये रेत बाकी सभी छोटी-मोटी चीजों को दर्शाती है. अगर आप जार को पहले रेत से भर देंगे तो कंकडों और पत्थरों के लिए कोई जगह नहीं बचेगी. यही आपकी life के साथ होता है. अगर आप अपनी सारा समय और उर्जा छोटी-छोटी चीजों में लगा देंगे तो आपके पास कभी उन चीजों के लिए time नहीं होगा जो आपके लिए important हैं. उन चीजों पर ध्यान दीजिये जो आपकी happiness के लिए ज़रूरी हैं.बच्चों के साथ खेलिए, अपने partner के साथ dance कीजिये. काम पर जाने के लिए, घर साफ़ करने के लिए,party देने के लिए,  हमेशा वक़्त होगा. पर पहले पत्थरों पर ध्यान दीजिये – ऐसी चीजें जो सचमुच matter करती हैं . अपनी priorities set कीजिये. बाकी चीजें बस रेत हैं.”
--- राधास्वामी जी !!

गुरु-दक्षिणा
एक बार एक शिष्य ने विनम्रतापूर्वक अपने गुरु जी से पूछा-‘गुरु जी,कुछ लोग कहते हैं कि  जीवन एक संघर्ष है,कुछ अन्य कहते हैं कि जीवन एक खेल है और कुछ जीवन को एक उत्सव की संज्ञा देते हैं | इनमें कौन सही है?’गुरु जी ने तत्काल बड़े ही धैर्यपूर्वक उत्तर दिया-‘पुत्र,जिन्हें गुरु नहीं मिला उनके लिए जीवन एक संघर्ष है; जिन्हें गुरु मिल गया उनका जीवन एक खेल है और जो लोग गुरु द्वारा बताये गए मार्ग पर चलने लगते हैं,मात्र वे ही जीवन को एक उत्सव का नाम देने का साहस जुटा पाते हैं |’यह उत्तर सुनने के बाद भी शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट न था| गुरु जी को इसका आभास हो गया |वे कहने लगे-‘लो,तुम्हें इसी सन्दर्भ में एक कहानी सुनाता हूँ| ध्यान से सुनोगे तो स्वयं ही अपने प्रश्न का उत्तर पा सकोगे |’ उन्होंने जो कहानी सुनाई,वह इस प्रकार थी-एक बार की बात है कि किसी गुरुकुल में तीन शिष्यों नें अपना अध्ययन सम्पूर्ण करने पर अपने गुरु जी से यह बताने के लिए विनती की कि उन्हें गुरुदाक्षिणा में, उनसे क्या चाहिए |गुरु जी पहले तो मंद-मंद मुस्कराये और फिर बड़े स्नेहपूर्वक कहने लगे-‘मुझे तुमसे गुरुदक्षिणा में एक थैला भर के सूखी पत्तियां चाहिए,ला सकोगे?’ वे तीनों मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए क्योंकि उन्हें लगा कि वे बड़ी आसानी से अपने गुरु जी की इच्छा पूरी कर सकेंगे |सूखी पत्तियाँ तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती हैं| वे उत्साहपूर्वक एक ही स्वर में बोले-‘जी गुरु जी, जैसी आपकी आज्ञा |’ अब वे तीनों शिष्य चलते-चलते एक समीपस्थ जंगल में पहुँच चुके थे |लेकिन यह देखकर कि वहाँ पर तो सूखी पत्तियाँ केवल एक मुट्ठी भर ही थीं ,उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा | वे सोच में पड़ गये कि आखिर जंगल से कौन सूखी पत्तियां उठा कर ले गया होगा? इतने में ही उन्हें दूर से आता हुआ कोई किसान दिखाई दिया | वे उसके पास पहुँच कर, उससे विनम्रतापूर्वक याचना करने लगे कि वह उन्हें केवल एक थैला भर सूखी पत्तियां दे दे |अब उस किसान ने उनसे क्षमायाचना करते हुए, उन्हें यह बताया कि वह उनकी मदद नहीं कर सकता क्योंकि उसने सूखी पत्तियों का ईंधन के रूप में पहले ही उपयोग कर लिया था | अब, वे तीनों, पास में ही बसे एक गाँव की ओर इस आशा से बढ़ने लगे थे कि हो सकता है वहाँ उस गाँव में उनकी कोई सहायता कर सके |वहाँ पहुँच कर उन्होंने जब एक व्यापारी को देखा तो बड़ी उम्मीद से उससे एक थैला भर सूखी पत्तियां देने के लिए प्रार्थना करने लगे लेकिन उन्हें फिर से एकबार निराशा ही हाथ आई क्योंकि उस व्यापारी ने तो, पहले ही, कुछ पैसे कमाने के लिए सूखी पत्तियों के दोने बनाकर बेच दिए थे लेकिन उस व्यापारी ने उदारता दिखाते हुए उन्हें एक बूढी माँ का पता बताया जो सूखी पत्तियां एकत्रित किया करती थी|पर भाग्य ने यहाँ पर भी उनका साथ  नहीं  दिया क्योंकि वह बूढी माँ तो उन पत्तियों को अलग-अलग करके कई प्रकार की ओषधियाँ बनाया करती थी |अब निराश होकर वे तीनों खाली हाथ ही गुरुकुल लौट गये |गुरु जी ने उन्हें देखते ही स्नेहपूर्वक पूछा- ‘पुत्रो,ले आये गुरुदक्षिणा ?’तीनों ने सर झुका लिया |गुरू जी द्वारा दोबारा पूछे जाने पर उनमें से एक शिष्य कहने लगा- ‘गुरुदेव,हम आपकी इच्छा पूरी नहीं कर पाये |हमने सोचा था कि सूखी पत्तियां तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती होंगी लेकिन बड़े ही आश्चर्य की बात है कि लोग उनका भी कितनी तरह से उपयोग करते हैं |’गुरु जी फिर पहले ही की तरह मुस्कराते हुए प्रेमपूर्वक बोले-‘निराश क्यों होते हो ?प्रसन्न हो जाओ और यही ज्ञान कि सूखी पत्तियां भी व्यर्थ नहीं हुआ करतीं बल्कि उनके भी अनेक उपयोग हुआ करते हैं; मुझे गुरुदक्षिणा के रूप में दे दो |’तीनों शिष्य गुरु जी को प्रणाम करके खुशी-खुशी अपने-अपने घर की ओर चले गये | वह शिष्य जो गुरु जी की कहानी एकाग्रचित्त हो कर सुन रहा था,अचानक बड़े उत्साह से बोला-‘गुरु जी,अब मुझे अच्छी तरह से ज्ञात हो गया है कि आप क्या कहना चाहते हैं |आप का  संकेत, वस्तुतः इसी ओर है न कि जब सर्वत्र सुलभ सूखी पत्तियां भी निरर्थक या बेकार नहीं होती हैं तो फिर हम कैसे, किसी भी वस्तु या व्यक्ति को छोटा और महत्त्वहीन मान कर उसका तिरस्कार कर सकते हैं?चींटी से लेकर हाथी तक और सुई से लेकर तलवार तक-सभी का अपना-अपना महत्त्व होता है |’गुरु जी भी तुरंत ही बोले-‘हाँ, पुत्र,मेरे कहने का भी यही तात्पर्य है कि हम जब भी किसी से मिलें तो उसे यथायोग्य मान देने का भरसक प्रयास करें ताकि आपस में स्नेह, सद्भावना,सहानुभूति एवं सहिष्णुता का विस्तार होता रहे और हमारा जीवन संघर्ष के बजाय उत्सव बन सके | दूसरे,यदि जीवन को एक खेल ही माना जाए तो बेहतर यही होगा कि हम  निर्विक्षेप,स्वस्थ एवं शांत प्रतियोगिता में ही भाग लें और अपने निष्पादन तथा निर्माण को ऊंचाई के शिखर पर ले जाने का अथक प्रयास करें |’अब शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट था | अंततः,मैं यही कहना चाहती हूँ कि यदि हम मन, वचन और कर्म- इन तीनों ही स्तरों पर इस कहानी का मूल्यांकन करें, तो भी यह कहानी खरी ही उतरेगी |सब के प्रति पूर्वाग्रह से मुक्त मन वाला व्यक्ति अपने वचनों से कभी भी किसी को आहत करने का दुःसाहस नहीं करता और उसकी यही ऊर्जा उसके पुरुषार्थ के मार्ग की समस्त बाधाओं को हर लेती है |वस्तुतः,हमारे जीवन का सबसे बड़ा ‘उत्सव’ पुरुषार्थ ही होता है-ऐसा विद्वानों का मत है |
--- राधास्वामी जी !!

Star Monument, Dinod

Star Monument, Dinod

Picture of Star Monument at Radha Swami Satsang Dinod
Picture of Star Monument at Radha Swami Satsang Dinod

The star monument of Tarachand ji Maharaj was completed in four years by Param Sant Huzur Kanwar Saheb ji Maharaj and by his blessings.

This building houses the holy Samādhi of Param Sant Tarachand ji Maharaj, called 'Bade Maharaj ji', by his followers. This building is situated in the Radha Swami Satsang bhawan Complex, Dinod, about 10 km from Bhiwani.[3]

Its foundation was laid on October 1, 1997 by Param Sant Huzur Kanwar Saheb ji Maharaj and completed four years later. The monument is a hexagonal pyramid in the shape of star, as Bade Maharaj ji's first name "Tara" means a star. Each side measures about 101 feet from the base built on a raised platform measuring about 2 meters. Three alternating sides are covered in white marble while the other three are in blue Italian glass. The building does not use pillars or columns to support itself. The three walls of the Samādhi have prominent stars on them while inside the holy Samādhi are infinite sparkling and twinkling stars. Ventilation and cooling techniques are traditional. Fresh air passes over the fountains is cooled and enters the Samādhi through openings and is expelled through vents at the top. During the humid season, the exhaust fans recycle the air.[3]

The Samādhi is constructed on a rectangular platform in the center. The statue of Bade Maharaj ji is erected near the western wall. Apart from this, six paintings depict the life of Bade Maharaj ji on the six corners of the Samādhi. The marble slippers placed on lotus flower near the Samādhi symbolizes the holy feet of Bade Maharaj ji.

The building is surrounded by flower beds, lawns, fountains and multicoloured marble paths. Stars were constructed inside the boundary wall. In the middle of each star, a moon is engraved depicting the name of Bade Maharaj ji. Every evening, a light and fountain display is conducted in the gardens. The garden houses a small hut on the right side in which Maharaj ji used to meditate. It is the most important place of meditation of Bade Maharaj ji. A holy well is on the left side, the water of which is alleged to relieve many diseases. One stair faces the main entrance gate and two others face the exit gates. Five fountains are in the garden. Two round fountains are on both sides of the main entrance. The other three are on the raised platform between the stairs around the Samādhi. On the right side from the entrance gate is a man-made waterfall in the north-eastern corner, made up of mountain shaped stones.

Param Sant Huzur Kanwar Saheb Ji Maharaj, born on March 2, 1948, is the present master of Radha Swami Satsang, Dinod. His mother being one interested in spiritual activities, inspired him to go to Dinod Ashram at the age of thirty. His very first meet with his Master Param Sant Tarachand, resulted in him being told he shall not return to his home and declared that he will die in the Dinod Ashram. His served his Master Param Sant Tarachand Ji for almost twenty years as he devoted days and nights in meditation and authored four popular spiritual books. He also served the education department of the state as a senior teacher for almost thirty years. In 1997, after departure of his master Param Sant Tarachand Ji, he resigned from his government post to carry out the job assigned to him. Like all previous saints, he does not spend a single penny of the satsang trust for his personal use, but instead donates the surplus money to the satsang from the pension he receives. He has been attributed to performing many miracles. Millions of worshipers listen to his sermons in India and abroad. [1]

Welcome Everyone

 

God Hears Silent Voice When Comes Your Heart.
 

 

 

 

 

RadhaSwami Sant Sandesh.

 

 

 

 


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