Jeevan Darshan

Subtitle


 

Welcome Everyone

 

इतने अच्छे बने कि आपकी उपेक्षा करने का किसी में साहस ही न हो !

सत्य स्वंय स्थिर है उसे किसी के सहारे कि जरूरत नही है !

जो उस पर चलता है वो भी उसी का रूप हो जाता है !

 

 

संत और साप
किसी गाँव में एक संत रहते थे ! संत जी करनी के धणी थे और इसी करनी के कारण उनकी ख्याति दूर दूर तक थी ! लोग कोसो मील पैदल चल कर संत जी के दर्शन करने एवं उनका आशीर्वाद प्राप्त करने आते थे ! जब किसी को कोई दुःख तकलीफ होती तो वह संत जी पास आकर अपने मन की व्यथा बताते और संत जी अपने ज्ञान से उनके लिए कोई नया रास्ता बताते एवं आशीर्वाद देते ! संत जी ने आस पास के बहुत से गाँव के लोगो को बुराई के मार्ग से हटा कर सत्मार्ग पार लगाया था जिसके करन उस प्रान्त में सुख, सम्रद्धि एवं खुशाली का बोल बाला था! उस प्रान्त का पत्ता पत्ता संत जी की महिमा गाता था !
उसी जगह पर एक साँप भी रहता था, उस साँप ने काफी लोगो एवं पशुओ को डस रखा था और लोगो के मन में उसका खौफ था ! संत जी की इतनी महिमा उस साँप की बड़ी प्रबल इच्छा थी की मैं भी ऐसे संत के दर्शन करू और उनसे दीक्षा लेकर अनपे पाप कर्म से बच कर अपने जीवन को सुधारू ! एक दिन संत जी जंगल के रस्ते कहीं जा रहे थे की उनको वह साँप रस्ते में मिल गया ! साँप ने अपना भाग्य को सरहाया की आज मुझे संत के दर्शन हुए और संत जी से कहने लगा की आप मुझे भी वो दीक्षा देकर मेरे जन्म को सफल करे ! संत जी ने कहा की सबसे पहले तो आप यह प्रण करो की आप सिर्फ अपने भोजन के लिए ही शिकार करोगे और किसी को बे वजह नहीं काटोगे ! साप ने कहा के ठीक है महाराज में ऐसा ही करूँगा ! संत जी प्रस्सन हुए और कहा की अगर तुम इस मार्ग पर चलोगे तो तुम्हे किसी प्रकार की परेशानी नहीं होगी और तुम सत्मर्गी बन जाओगे !
बस फिर क्या था साँप ने अपने आचरण बिलकुल ही बदल लिया ! अब वह सिर्फ अपने भोजन के लिए ही शिकार करता था और लोगो को कुछ नहीं कहता था ! पहले जिस साँप से लोग दूर भागते थे अब अगर वही साँप सड़क के किनारे पर पड़ा होता तो लोग बेफिक्र होकर उसके साथ से निकल जाते थे और कई बार तो उसे सड़क उठा कर जंगल की ओर फेक देते ! चूँकि साँप अब संत जी के बताए मार्ग पर चल रहा था तो लोगो के मन में साँप के लिए बिलकुल भी डर नहीं रहा और बल्कि साँप को लोगो से छुपने तक की नौबत आ गई थी ! हर एक दिन साँप के लिए एक नई परीक्षा लेकर आता था ! एक दिन तो हद ही हो गई, एक ज़मींदार अपने खेत में जवार काट रहा था, जवार काटने के बाद जब वह उसका गट्ठर बनाने के लिए रस्सी खोज रहा था तो अचानक उसकी नज़र उसी साँप पर पड़ी जो की झाडियो में छुपा हुआ था ! जमींदार ने सोचा की कहा रस्सी खोजने में वक़्त जाया कर रहा हु इस साँप को ही रस्सी के माफिक इस्तिमाल कर लेता हु ! उसने वही किया, उसने साँप को पकड़ कर गठरी पर लपेटा और उसकी पूछ और मुह पकड़ कर एक जोर की गांठ लगाने लगा ! चूँकि साँप वचनबद्ध था वह यह सब सहता गया, अपने जीव की ऐसी हालत देख कर संत जी वही पर प्रगट हो कर बोले कहो क्या हाल है और ये क्या हालत बना राखी है ! साँप बिलकुल ही टूटे हुए मन से बोला गुरु जी मैं तो आपके वचन की पालना कर रहा हु ! संत जी कहा की क्या आपको मेरा वचन याद है तो कहो की क्या वचन था ! साँप ने कहा की गुरु जी आप ने कहा था की मैं शिकार केवल अपने भोजन के लिए ही करूँगा और किसी को नहीं ड़सुंगा ! संत जी बोले बिलकुल ठीक लेकिन तुम्हारी हालत ये कैसी हुई ! संत जी ने कहा की तुम मेरी बात को समझे ही नहीं अरे मुर्ख मैंने तुमे लोगो को डसने के मना किया था लेकिन तू अपने प्राण रक्षा के लिए "फू -फा " तो कर ही सकता है ! साप गुरु जी की बात को समझ गया और उसकी जान में जान आई और जैसे ही वो जमींदार साँप की पूछ और मुह की गांठ लगाने वाला था तभी साँप ने अपने मुह से जोर से "फू " की आवाज़ निकाली ! बस फिर क्या था ज़मींदार वही अपनी कटी हुई जवार छोड़ कर भागा और साँप आज़ाद हुआ !
कहानी का तात्पर्य यह है की हम सत्संगी हो गाये इसके मतलब यह है की हमने अपने बुरे कर्म छोड़ दिए, हमने लड़ाई झगरे छोड़ दिए, लोगो पर अन्न्याये करने छोड़ दिए, झूठ बोलना छोड़ दिए और अवगुणों को तिलांजलि दे दी परन्तु इसका यह कतई मतलब नहीं है की हम दुष्टों से अपनी एवं अपने परिवार की रक्षा ना करे और अन्नाये को सहे ! जब हमारा सामना दुष्टों से होता है तो हमे जरूर ही अपनी एवं अपने परिवार की सुरक्षा के लिए " फू - फा" करनी चाहिए अन्यथा कल को तो कोई हमे हमारे घर से भी बेघर कर सकता है ! यह हमारे सतगुरु की सीख नहीं है !!
--- राधास्वामी जी !!

 


संगति का असर
पुराने समय की बात है। एक राज्य में एक राजा था। किसी कारण से वह अन्य गाँव में जाना चाहता था। एक दिन वह धनुष-बाण सहित पैदल ही चल पड़ा। चलते-चलते राजा थक गया। अत: वह बीच रास्ते में ही एक विशाल पेड़ के नीचे बैठ गया। राजा अपने धनुष-बाण बगल में रखकर, चद्दर ओढ़कर सो गया। थोड़ी ही देर में उसे गहरी नींद लग गई।
उसी पेड़ की खाली डाली पर एक कौआ बैठा था। उसने नीचे सोए हुए राजा पर बीट कर दी। बीट से राजा की चादर गंदी हो गई थी। राजा खर्राटे ले रहा था। उसे पता नहीं चला कि उसकी चादर खराब हो गई है।
कुछ समय के पश्चात कौआ वहाँ से उड़कर चला गया और थोड़ी ही देर में एक हंस उड़ता हुआ आया। हंस उसी डाली पर और उसी जगह पर बैठा, जहाँ पहले वह कौआ बैठा हुआ था अब अचानक राजा की नींद खुली। उठते ही जब उसने अपनी चादर देखी तो वह बीट से गंदी हो चुकी थी।
राजा स्वभाव से बड़ा क्रोधी था। उसकी नजर ऊपर वाली डाली पर गई, जहाँ हंस बैठा हुआ था। राजा ने समझा कि यह सब इसी हंस की ओछी हरकत है। इसी ने मेरी चादर गंदी की है।
क्रोधी राजा ने आव देखा न ताव, ऊपर बैठे हंस को अपना तीखा बाण चलाकर, उसे घायल कर दिया। हंस बेचारा घायल होकर नीचे गिर पड़ा और तड़पने लगा। वह तड़पते हुए राजा से कहने लगा-
'अहं काको हतो राजन्!
हंसाऽहंनिर्मला जल:।
दुष्ट स्थान प्रभावेन,
जातो जन्म निरर्थक।।'
अर्थात हे राजन्! मैंने ऐसा कौन सा अपराध किया, तुमने मुझे अपने तीखे बाणों का निशाना बनाया है? मैं तो निर्मल जल में रहने वाला प्राणी हूँ? ईश्वर की कैसी लीला है। सिर्फ एक बार कौए जैसे दुष्ट प्राणी की जगह पर बैठने मात्र से ही व्यर्थ में मेरे प्राण चले जा रहे हैं, फिर दुष्टों के साथ सदा रहने वालों का क्या हाल होता होगा?
हंस ने प्राण छोड़ने से पूर्व कहा - 'हे राजन्! दुष्टों की संगति नहीं करना। क्योंकि उनकी संगति का फल भी ऐसा ही होता है।' राजा को अपने किए अपराध का बोध हो गया। वह अब पश्चाताप करने लगा।
--- राधास्वामी जी !!

 


करणी बड़ी है
एक डाकू गुरु नानकदेवजी के पास आया और चरणों में माथा टेकते हुए बोला- "मैं डाकू हूँ, अपने जीवन से तंग हूँ। मैं सुधरना चाहता हूँ, मेरा मार्गदर्शन कीजिए, मुझे अंधकार से उजाले की ओर ले चलिए।" नानकदेवजी ने कहा-"तुम आज से चोरी करना और झूठ बोलना छोड़ दो, सब ठीक हो जाएगा।" डाकू प्रणाम करके चला गया। कुछ दिनों बाद वह फिर आया और कहने लगा-"मैंने झूठ बोलने और चोरी से मुक्त होने का भरसक प्रयत्न किया, किंतु मुझसे ऐसा न हो सका। मैं चाहकर बदल नहीं सका। आप मुझे उपाय अवश्य बताइए।"
गुरु नानक सोचने लगे कि इस डाकू को सुधरने का क्या उपाय बताया जाए। उन्होंने अंत में कहा-"जो तुम्हारे मन में जो आए करो, लेकिन दिनभर झूठ बोलने, चोरी करने और डाका डालने के बाद शाम को लोगों के सामने किए हुए कामों का बखान कर दो।"
डाकू को यह उपाय सरल जान पड़ा। इस बार डाकू पलटकर नानकदेवजी के पास नहीं आया क्योंकि जब वह दिनभर चोरी आदि करता और शाम को जिसके घर से चोरी की है उसकी चौखट पर यह सोचकर पहुँचता कि नानकदेवजी ने जो कहा था कि तुम अपने दिनभर के कर्म का बखान करके आना लेकिन वह अपने बुरे कामों के बारे में बताते में बहुत संकोच करता और आत्मग्लानि से पानी-पानी हो जाता। वह बहुत हिम्मत करता कि मैं सारे काम बता दूँ लेकिन वह नहीं बता पाता। हताश-निराश मुँह लटकाए वह डाकू एक दिन अचानक नानकदेवजी के सामने आया। अब तक न आने का कारण बताते हुए उसने कहा-"मैंने तो उस उपाय को बहुत सरल समझा था, लेकिन वह तो बहुत कठिन निकला। लोगों के सामने अपनी बुराइयाँ कहने में लज्जा आती है, अतः मैंने बुरे काम करना ही छोड़ दिया।" नानकदेवजी ने उसे अपराधी से अच्छा बना दिया।
--- राधास्वामी जी !!

 

 

कार्य करने से पहले सोचना बुद्धिमानी है
उज्जयिनी में माधव भगत अपने परिवार के साथ रहता था। एक दिन माधव भगत घर में अकेला था। दैवयोग से उसी समय राजमहल से माधव भगत को भोजन के लिए विशेष निमंत्रण प्राप्त हो जाता है। अब वह इस धर्म संकट में आ गया कि यदि बालक को छोड़कर जाता हूँ तो इसकी देख-रेख कौन करेगा और यदि भोजन के लिए नहीं जाता हूँ तो एक ओर राजा कुपित हो जाएँगे। ऐसा अवसर बार-बार नहीं मिलता।
इसी उधेड़बुन में उसको एकाएक विचार आया कि मैंने घर पर एक नेवले को बहुत सालों से पाला हुआ है। अतः माधव ने अपने पुत्र की तरह पाले हुए नेवले को बालक की रक्षा के लिए उसके पालने के पास बैठा दिया और स्वयं राजभवन चला गया। इसके बाद बालक के पालने के पास अचानक एक काला साँप आ पहुँचता है।
नेवले ने तुरंत झपट्टा मार कर साँप के कई टुकड़े कर दिए। इस बीच जब राजभवन से लौटने पर माधव भगत ने उस रक्तरंजित नेवले को देखा तो उसे लगा कि नेवले ने उसके बच्चे को मारकर खा लिया है।
बस फिर क्या था, उस भगत ने बिना विचारे नेवले को मार डाला। लेकिन जब वह बच्चे के पालने के पास पहुँचा तो वहाँ बच्चा सकुशल खेल रहा था और पालने के पास काला सर्प मरा पड़ा था।
अब माधव भगत को बहुत पछतावा हुआ कि उसने बिना विचार किए ही उस स्वामिभक्त नेवले को मार डाला। इसीलिए नीतिकार कहते हैं बिना विचारे कुछ नहीं करना चाहिए। ऐसा करने वाले बाद में पछताते हैं।
--- राधास्वामी जी !!

 



सच्चाई छुपती नही है
मुल्ला नसीरूद्दीन की एक दोस्त से कई वर्षों के बाद मुलाकात हुई। वह उसके गले मिला, पर उसके खराब वस्त्र देख उसके मन में करुणा जागी और उसने अपने लिए सिले कपड़े उसे पहनने को दिए। ये कपड़े उसने अपने लिए सिलाए तो थे, मगर उन्हें कीमती जान वह पहनने में हिचकिचाता था। भोजन करने के बाद नसीरूद्दीन मित्र से बोला, 'चलो, मैं तुम्हें अपने मित्रों से परिचय कराता हूँ।' रास्ते में मित्र के शरीर पर अपने कीमती कपड़े देख नसीरूद्दीन सोचने लगा-यह तो बिलकुल अमीर लगता है और मैं उसका नौकर। मगर कपड़े तो अब वापस लिए नहीं जा सकते।
इतने में उसके एक मित्र का घर दिखाई दिया। वे दोनों अंदर गए। नसीरूद्दीन जब मित्र से उसका परिचय कराने लगा, तो उसका ध्यान वस्त्रों की ओर गया और वह बोला, 'यह मेरा बरसों पुराना दोस्त है। इसने जो कपड़े पहने हैं, वे मेरे ही हैं।' दोस्त ने सुना, तो बुरा लगा। उसने उस समय तो कुछ नहीं कहा, मगर रास्ते में उसने कहा, 'आपको यह नहीं कहना था कि ये आपके कपड़े हैं।'
'ठीक है! अब मैं ऐसा नहीं कहूँगा,' नसीरूद्दीन ने जवाब दिया। मगर रास्ते में जब एक परिचित से मुलाकात हुई, तो अपने दोस्त का परिचय कराते समय कपड़ों की ओर ध्यान गया, और उसके मुँह से निकल पड़ा, 'इन्होंने ये जो कपड़े पहने हैं, वे मेरे नहीं इन्हीं के हैं।' दोस्त को फिर बुरा लगा और उसने रास्ते में कहा, 'आपको मेरे कपड़े नहीं है-ऐसा नहीं कहना था नसीरूद्दीन ने अफसोस जाहिर करते हुए कहा, 'मेरी जबान धोखा खा गई।'
उसने निश्चय किया कि अब वह कपड़ों का जिक्र ही नहीं करेगा, मगर उसके अंतर्चक्षुओं को तो वे कपड़े ही दिखाई दे रहे थे, इसलिए तीसरे मित्र से मुलाकात होने पर उसके मुँह से निकल पड़ा, 'ये मेरे गहरे दोस्त हैं। बड़े अच्छे हैं, मगर मैं यह नहीं बताऊँगा कि इन्होंने जो कपड़े पहने हैं, वे मेरे हैं या इनके।' अब दोस्त से न रहा गया। वह वापस चल दिया। और उसने घर लौटकर गुस्सा जताते हुए कपड़े वापस कर दिए और दोस्त को छोड़कर वहाँ से चलता बना। नसीरूद्दीन को बड़ा पश्चाताप हुआ, किंतु अब कोई उपाय नहीं था।
--- राधास्वामी जी !!

 


ज्ञान और चरित्र
एक राजपुरोहित थे। वे अनेक विधाओं के ज्ञाता होने के कारण राज्य में अत्यधिक प्रतिष्ठित थे। बड़े-बड़े विद्वान उनके प्रति आदरभाव रखते थे पर उन्हें अपने ज्ञान का लेशमात्र भी अहंकार नहीं था। उनका विश्वास था कि ज्ञान और चरित्र का योग ही लौकिक एवं परमार्थिक उन्नति का सच्चा पथ है। प्रजा की तो बात ही क्या स्वयं राजा भी उनका सम्मान करते थे और उनके आने पर उठकर आसन प्रदान करते थे।
एक बार राजपुरोहित के मन में जिज्ञासा हुई कि राजदरबार में उन्हें आदर और सम्मान उनके ज्ञान के कारण मिलता है अथवा चरित्र के कारण? इसी जिज्ञासा के समाधान हेतु उन्होंने एक योजना बनाई। योजना को क्रियान्वित करने के लिए राजपुरोहित राजा का खजाना देखने गए। खजाना देखकर लौटते समय उन्होंने खजाने में से पाँच बहुमूल्य मोती उठाए और उन्हें अपने पास रख लिया। खजांची देखता ही रह गया। राजपुरोहित के मन में धन का लोभ हो सकता है। खजांची ने स्वप्न में भी नहीं सोचा था। उसका वह दिन उसी उधेड़बुन में बीत गया।
दूसरे दिन राजदरबार से लौटते समय राजपुरोहित पुन: खजाने की ओर मुड़े तथा उन्होंने फिर पाँच मोती उठाकर अपने पास रख लिए। अब तो खजांची के मन में राजपुरोहित के प्रति पूर्व में जो श्रद्धा थी वह क्षीण होने लगी।
तीसरे दिन जब पुन: वही घटना घटी तो उसके धैर्य का बाँध टूट गया। उसका संदेह इस विश्वास में बदल गया कि राजपुरोहित की ‍नीयत निश्चित ही खराब हो गई है।
उसने राजा को इस घटना की विस्तृत जानकारी दी। राजा को इस सूचना से बड़ा आघात पहुँचा। उनके मन में राजपुरोहित के प्रति आदरभाव की जो प्रतिमा पहले से प्रतिष्ठित थी वह चूर-चूर होकर बिखर गई।
चौथे दिन जब राजपुरोहित सभा में आए तो राजा पहले की तरह न सिंहासन से उठे और न उन्होंने राजपुरोहित का अभिवादन किया, यहाँ तक कि राजा ने उनकी ओर देखा तक नहीं। राजपुरोहित तत्काल समझ गए कि अब योजना रंग ला रही है। उन्होंने जिस उद्देश्य से मोती उठाए थे, वह उद्देश्य अब पूरा होता नजर आने लगा था।
यही सोचकर राजपुरोहित चुपचाप अपने आसन पर बैठ गए। राजसभा की कार्यवाही पूरी होने के बाद जब अन्य दरबारियों की भाँति राजपुरोहित भी उठकर अपने घर जाने लगे तो राजा ने उन्हें कुछ देर रुकने का आदेश दिया। सभी सभासदों के चले जाने के बाद राजा ने उनसे पूछा - 'सुना है आपने खजाने में कुछ गड़बड़ी की है।'
इस प्रश्न पर जब राजपुरोहित चुप रहे तो राजा का आक्रोश और बढ़ा। इस बार वे कुछ ऊँची आवाज में बोले -'क्या आपने खजाने से कुछ मोती उठाए हैं?' राजपुरोहित ने मोती उठाने की बात को स्वीकार किया।
राजा का अगला प्रश्न था - 'आपने कितेने मोती उठाए और कितनी बार?' राजा ने पुन: पूछा - 'वे मोती कहाँ हैं?'
राजपुरोहित ने एक पुड़िया जेब से निकाली और राजा के सामने रख दी जिसमें कुल पंद्रह मोती थे। राजा के मन में आक्रोश, दुख और आश्चर्य के भाव एक साथ उभर आए।
राजा बोले - 'राजपुरोहित जी आपने ऐसा गलत काम क्यों किया? क्या आपको अपने पद की गरिमा का लेशमात्र भी ध्यान नहीं रहा। ऐसा करते समय क्या आपको लज्जा नहीं आई? आपने ऐसा करके अपने जीवनभर की प्रतिष्ठा खो दी। आप कुछ तो बोलिए, आपने ऐसा क्यों किया?
राजा की अकुलाहट और उत्सुकता देखकर राजपुरोहित ने राजा को पूरी बात विस्तार से बताई तथा प्रसन्नता प्रकट करते हुए राजा से कहा - 'राजन् केवल इस बात की परीक्षा लेने हेतु कि ज्ञान और चरित्र में कौन बड़ा है, मैंने आपके खजाने से मोती उठाए थे अब मैं निर्विकल्प हो गया हूँ। यही नहीं आज चरित्र के प्रति मेरी आस्था पहले की अपेक्षा और अधिक बढ़ गई है।
आपसे और आपकी प्रजा से अभी तक मुझे जो प्यार और सम्मान मिला है। वह सब ज्ञान के कारण नहीं ‍अपितु चरित्र के ही कारण था। आपके खजाने में सबसे अधिक बहुमू्ल्य वस्तु सोना-चाँदी या हीरा-मोती नहीं बल्कि चरित्र है।
अत: मैं चाहता हूँ कि आप अपने राज्य में चरित्र संपन्न लोगों को अधिकाधिक प्रोत्साहन दें ताकि चरित्र का मूल्य उत्तरोत्तर बढ़ता रहे। कहा जाता है -
धन गया, कुछ नहीं गया,
स्वास्थ्‍य गया, कुछ गया।
चरित्र गया तो सब कुछ गया।
--- राधास्वामी जी !!

 

समर्पण
जापान के जैन समुदाय के एक महान आचार्य थे, रिंजेई। उनकी ख्‍याति दूर-दूर तक थी। एक दिन एक युवक उनके पास आया। उसने कहा - मुनिवर मैं स्वर्ग और नरक के रहस्य को जानना चाहता हूँ। कृपया मुझे समझाएँ। रिंजेई ने गौर से उसे देखा। फिर प्रश्न किया वह मैं समझाता हूँ। पर तुम कौन हो? करते क्या हो? युवक ने बड़े दर्प से कहा - मैं योद्धा हूँ। राजा की सेना में एक उच्च पद पर...
रिंजेई बोले - योद्धा? तुम क्या योद्धा होंगे। देखने में तो घसियारे या मोची लगते हो।
युवक ने तैश में आकर कमरबंद में खोंसी हुई तलवार निकाल ली और बोला - क्या यह तलवार आपको दिखाई नहीं दी? क्या यह मेरे योद्धा होने का प्रमाण नहीं है?
रिंजेई पुन: उपहासपूर्वक उसे देखते हुए बोले - हुंह। तलवार! इस तलवार से तो सब्जी-भाजी भी न कटती होगी। तुम इससे घास छीलते होगे।
युवक तलवार को म्यान से खींचकर बोला - बहुत हो गया। अब आपने एक भी अपशब्द कहा तो यह तलवार आपकी गर्दन धड़ से अलग करके ही म्यान में लौटेगी।
रिंजेई के चेहरे पर एक शांत मुस्कान तैरने लगी। वह बोले - युवक, अब तुम नरक में हो। अच्छी तरह देख लो। समझ लो।
अपना संयम खोने और आवेश की ज्वाला में जलने का परिणाम क्षण भर में युवक के सम्मुख स्पष्ट हो गया। उसने लज्जित होकर क्षमा माँगी और सिर झुकाकर आचार्य रिंजेई के चरणों के समीप बैठ गया। रिंजेई ने कहा - वत्स, यही स्वर्ग है।
--- राधास्वामी जी !!

 


संसार का भरम
एक बार इटली से संत फ्रांसिस के पास एक सत्संगी युवक आया। संत ने उससे हाल-चाल पूछा, तो उसने स्वयं को अत्यंत सुखी बताया! वह बोला, 'मुझे अपने परिवार के सभी सदस्यों पर बड़ा गर्व है। उनके व्यवहार से मैं संतुष्ट हूँ।'
संत बोले, 'तुम्हें अपने परिवार के प्रति ऐसी धारणा नहीं बनानी चाहिए। इस दुनिया में अपना कोई नहीं होता। जहां तक मां-बाप की सेवा और पत्नी-बच्चों के पालन-पोषण का संबंध है, उसे तो कर्तव्य समझकर ही करना चाहिए। उनके प्रति मोह या आसक्ति रखना उचित नहीं।'
युवक को बात जँची नहीं, बोला, 'आपको विश्वास नहीं कि मेरे परिवार के लोग मुझ पर अत्यधिक स्नेह करते हैं। यदि एक दिन घर न जाऊँ, तो उनकी भूख-प्यास उड़ जाती है और नींद हराम हो जाती है और पत्नी तो मेरे बिना जीवित ही नहीं रह सकती।'
संत बोले, 'तुम्हें प्राणायाम तो आता ही है। कल सुबह उठने के बजाय प्राणवायु मस्तक में खींचकर निश्चेष्ट पड़े रहना। मैं आकर सब सम्हाल लूँगा।'
दूसरे दिन युवक ने वैसा ही किया। उसे निर्जीव जान कर घर के सब लोग विलाप करने लगे। इतने में फ्रांसिस वहाँ पहुँचे। सब लोग उनके चरणों पर गिर पड़े। वे उनसे बोले, 'आप लोग शोक मत करें। मैं मंत्र के बल पर इसे जिलाने का प्रयत्न करूँगा, मगर इसके लिए कटोरी भर पानी किसी को पीना पड़ेगा। उस पानी में ऐसी शक्ति होगी कि पीनेवाला तो मर जाएगा, मगर उसके बदले यह युवक जी उठेगा।'
यह सुनते ही सब एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। पानी पीने के लिए किसी को आगे न आते देख संत बोले, 'तब मैं ही पीता हूँ।' इस पर सब उठे, 'महाराज! आप धन्य हैं! सचमुच संत महात्मा परोपकार के लिए ही जन्म लेते हैं। आपके लिए जीवन-मृत्यु एक समान हैं। यदि आप जिला सकें, तो बड़ी कृपा होगी।'
युवक को संत के कथन की प्रतीति हो गई थी। प्राणायाम समाप्त कर वह उठ बैठा और बोला, 'महाराज, आप पानी पीने का कष्ट न करें। सांसारिक संबंध क्षणिक और मिथ्या होते हैं, वह मैं जान गया हूँ। आपने सचमुच मुझे नया जीवन दिया है-प्रबुद्ध जीवन, जिससे एक नई बात मुझे मालूम हो गई है।'
--- राधास्वामी जी !!

 


सुकरात के तीन छोटे प्रश्न
प्राचीन यूनान में सुकरात नाम के विद्वान हुए हैं। वे ज्ञानवान और विनम्र थे। एक बार वे बाजार से गुजर रहे थे तो रास्ते में उनकी मुलाकात एक परिचित व्यक्ति से हुई। उन सज्जन ने सुकरात को रोककर कुछ बताना शुरू किया। वह कहने लगा कि 'क्या आप जानते हैं कि कल आपका मित्र आपके बारे में क्या कह रहा था?'
सुकरात ने उस व्यक्ति की बात को वहीं रोकते हुए कहा - सुनो, भले व्यक्ति। मेरे मित्र ने मेरे बारे में क्या कहा यह बताने से पहले तुम मेरे तीन छोटे प्रश्नों का उत्तर दो। उस व्यक्ति ने आश्चर्य से कहा - 'तीन छोटे प्रश्न'।
सुकरात ने कहा - हाँ, तीन छोटे प्रश्न।
पहला प्रश्न तो यह कि क्या तुम मुझे जो कुछ भी बताने जा रहे हो वह पूरी तरह सही है?
उस आदमी ने जवाब दिया - 'नहीं, मैंने अभी-अभी यह बात सुनी और ...।'
सुकरात ने कहा- कोई बात नहीं, इसका मतलब यह कि तुम्हें नहीं पता कि तुम जो कहने जा रहे हो वह सच है या नहीं।'
अब मेरे दूसरे प्रश्न का जवाब दो कि 'क्या जो कुछ तुम मुझे बताने जा रहे हो वह मेरे लिए अच्छा है?' आदमी ने तुरंत कहा - नहीं, बल्कि इसका ठीक उल्टा है। सुकरात बोले - ठीक है। अब मेरे आखिरी प्रश्न का और जवाब दो कि जो कुछ तुम मुझे बताने जा रहे हो वह मेरे किसी काम का है भी या नहीं।
व्यक्ति बोला - नहीं, उस बात में आपके काम आने जैसा तो कुछ भी नहीं है। तीनों प्रश्न पूछने के बाद सुकरात बोले - 'ऐसी बात जो सच नहीं है, जिसमें मेरे बारे में कुछ भी अच्छा नहीं है और जिसकी मेरे लिए कोई उपयोगिता नहीं है, उसे सुनने से क्या फायदा। और सुनो, ऐसी बातें करने से भी क्या फायदा।
--- राधास्वामी जी !!

 



एक भला आदमी
पहाड़ियों के बीच एक छोटा सा गाँव था। गाँव में बसंत के आसपास पेड़ों के पुराने पत्ते झड़ जाते और सड़कों पर कचरा जमा हो जाता। पत्ते तालाबों में भी तैरते रहते। पूरे शहर में कचरा ही कचरा नजर आता।
ऐसे में गाँव के नगर पालिका सदस्यों ने तय किया कि इस काम के लिए किसी को नियुक्त कर लेना चाहिए ताकि वह रोजाना सफाई का काम देखे।
कुछ ही दिनों में इस काम के लिए एक बूढ़े व्यक्ति को नियुक्त कर दिया गया। बूढ़ा अपने काम के प्रति ईमानदार था। वह दिनभर काम में लगा रहता।
बूढ़ा रोजाना सड़कों की सफाई करता, तालाब की सुंदरता का खयाल रखता और पेड़ों की सलीके से काँट-छाँटकर करता। देखते ही देखते उसने पूरे कस्बे की शक्ल सुधार दी। बूढ़े की देखरेख में कस्बा दिनोंदिन निखरता गया।
कुछ ही महीनों में कस्बा इतना सुंदर हो गया। कई पंछी वहाँ आने लगे। पर्यटक भी अपनी छुट्‍टियाँ बिताने के लिए कस्बे में रुकना पसंद करने लगे। कस्बे की नगर पंचायत को सुंदरता के लिए कई पुरस्कार मिले और कस्बे की आय में भी बढ़ोतरी हुई।
इसके बाद काउंसिल की एक बैठक और हुई। इसमें किसी सदस्य की नजर बूढ़े को दी जाने वाली तनख्वाह पर पड़ी। उसे यह खर्च अनुपयुक्त लगा। वह बोला कि गाँव की सफाई के लिए जो आदमी रखा है उस पर बहुत पैसा खर्च हो रहा है। बाकी सदस्यों ने इसमें हाँ मिलाई और बूढ़े को काम से हटाने का निर्णय ‍ले लिया गया।
अगले दिन से बूढ़े को काम पर से हटा दिया गया। बूढ़े ने अपने लिए कुछ और काम ढूँढ लिया।
बूढ़े ने जिस दिन से अपना काम बंद कर दिया। उसके कुछ दिनों तक तो कोई खास फर्क दिखाई नहीं दिया। पर महीने, दो महीने में कस्बे की हालत ‍फिर से पहले जैसी हो गई। लोगों ने देखा कि पेड़ों के पत्तों से सड़कें अटी पड़ी हैं। तालाबों में कचरा जमा हो गया है। पंछियों ने इस तरफ आना छोड़ दिया और पर्यटकों का आना भी बंद हो गया है। अचानक कस्बे की रौनक चली गई है।
काउंसिल ने फिर से बैठक की। सभी ने स्वीकार किया कि उस बूढ़े व्यक्ति ने ही इस कस्बे को सुंदर बनाया था। सदस्यों ने माना कि उनसे गलती हुई। उन्हें उस भले आदमी की कद्र करना चाहिए थी। कुछ दिनों बाद उस बूढ़े को फिर से उसके काम पर रख लिया गया। इस बार उसकी तनख्वाह भी पहले से बढ़ा दी गई।
सीख : ठीक ही कहा गया है अच्‍छे काम की जरूरत दुनिया में हमेशा बनी रहेगी। लोग भले शुरुआत में अच्छे काम को नहीं पहचानें, पर देर-सबेर अच्छा काम अपनी जगह खुद बना लेता है।
--- राधास्वामी जी !!

 

 

प्रभु को भी प्रिय है सरलता
सतपुड़ा के वन प्रांत में अनेक प्रकार के वृक्ष में दो वृक्ष सन्निकट थे। एक सरल-सीधा चंदन का वृक्ष था दूसरा टेढ़ा-मेढ़ा पलाश का वृक्ष था। पलाश पर फूल थे। उसकी शोभा से वन भी शोभित था। चंदन का स्वभाव अपनी आकृति के अनुसार सरल तथा पलाश का स्वभाव अपनी आकृति के अनुसार वक्र और कुटिल था, पर थे दोनों पड़ोसी व मित्र। यद्यपि दोनों भिन्न स्वभाव के थे। परंतु दोनों का जन्म एक ही स्थान पर साथ ही हुआ था। अत: दोनों सखा थे।
कुठार लेकर एक बार लकड़हारे वन में घुस आए। चंदन का वृक्ष सहम गया। पलाश उसे भयभीत करते हुए बोला - 'सीधे वृक्ष को काट दिया जाता है। ज्यादा सीधे व सरल रहने का जमाना नहीं है। टेढ़ी उँगली से घी निकलता है। देखो सरलता से तुम्हारे ऊपर संकट आ गया। मुझसे सब दूर ही रहते हैं।'
चंदन का वृक्ष धीरे से बोला - 'भाई संसार में जन्म लेने वाले सभी का अंतिम समय आता ही है। परंतु दुख है कि तुमसे जाने कब मिलना होगा। अब चलते हैं। मुझे भूलना मत ईश्वर चाहेगा तो पुन: मिलेंगे। मेरे न रहने का दुख मत करना। आशा करता हूँ सभी वृक्षों के साथ तुम भी फलते-फूलते रहोगे।'
लकड़हारों ने आठ-दस प्रहार किए चंदन उनके कुल्हाड़े को सुगंधित करता हुआ सद्‍गति को प्राप्त हुआ। उसकी लकड़ी ऊँचे दाम में बेची गई। भगवान की काष्ठ प्रतिमा बनाने वाले ने उसकी बाँके बिहारी की मूर्ति बनाकर बेच दी। मूर्ति प्रतिष्ठा के अवसर पर यज्ञ-हवन का आयोजन रखा गया। बड़ा उत्सव होने वाला था।
यज्ञीय समिधा (लकड़ी) की आवश्यकता थी। लकड़हारे उसी वन प्रांतर में प्रवेश कर उस पलाश को देखने लगा जो काँप रहा था। यमदूत आ पहुँचे। अपने पड़ोसी चंदन के वृक्ष की अंतिम बातें याद करते हुए पलाश परलोक सिधार गया। उसके छोटे-छोटे टुकड़े होकर यज्ञशाला में पहुँचे।
यज्ञ मण्डप अच्छा सजा था। तोरण द्वार बना था। वेदज्ञ पंडितजन मंत्रोच्चार कर रहे थे। समिधा को पहचान कर काष्ट मूर्ति बन चंदन बोला - 'आओ मित्र! ईश्वर की इच्‍छा बड़ी बलवान है। फिर से तुम्हारा हमारा मिलन हो गया। अपने वन के वृक्षों का कुशल मंगल सुनाओ। मुझे वन की बहुत याद आती है। मंदिर में पंडित मंत्र पढ़ते हैं और मन में जंगल को याद करता हुआ रहता हूँ।
पलाश बोला - 'देखो, यज्ञ मंडप में यज्ञाग्नि प्रज्जवलित हो चुकी है। लगता है कुछ ही पल में राख हो जाऊँगा। अब नहीं मिल सकेंगे। मुझे भय लग रहा है। ‍अब बिछड़ना ही पड़ेगा।'
चंदन ने कहा - 'भाई मैं सरल व सीधा था मुझे परमात्मा ने अपना आवास बनाकर धन्य कर‍ दिया तुम्हारे लिए भी मैंने भगवान से प्रार्थना की थी अत: यज्ञीय कार्य में देह त्याग रहे हो। अन्यथा दावानल में जल मरते। सरलता भगवान को प्रिय है। अगला जन्म मिले तो सरलता, सीधापन मत छोड़ना। सज्जन कठिनता में भी सरलता नहीं छोड़ते जबकि दुष्ट सरलता में भी कठोर हो जाते हैं। सरलता में तनाव नहीं रहता। तनाव से बचने का एक मात्र उपाय सरलता पूर्ण जीवन है।'
बाबा तुलसीदास के रामचरितमानस में भगवान ने स्वयं ही कहा है -
निरमल मन जन सो मोहिं पावा।
मोहिं कपट छल छिद्र न भावा।।
अचानक पलाश का मुख एक आध्‍यात्मिक दीप्ति से चमक उठा।
--- राधास्वामी जी !!

 


मन की एकाग्रता से सारे काम होते है
एक बार स्वामी विवेकानंद जी मेरठ आए। उनको पढ़ने का खूब शौक था। इसलिए वे अपने शिष्य अखंडानंद द्वारा पुस्तकालय से पुस्तकें पढ़ने के लिए मँगवाते थे। केवल एक ही दिन में पुस्तक पढ़कर वापस करने के कारण ग्रंथपाल क्रोधित हो गया। उसने ग्रंथपाल से कहा कि रोज-रोज पुस्तकें बदलने में मुझे तकलीफ होती है। आप यह पुस्तक पढ़ते हैं कि केवल पन्ने ही बदलते हैं?
अखंडानंद ने यह बात स्वामी जी को बताई तो वे स्वयं पुस्तकालय में गए और ग्रंथपाल से कहा ये सब पुस्तकें मैंने मँगवाई थीं। ये सब पुस्तकें मैंने पढ़ी हैं। आप मुझसे इन पुस्तकों में से कोई भी प्रश्न पूछ सकते हैं। ग्रंथपाल को शंका थी कि पुस्तकों को पढ़ने समझने के लिए समय तो चाहिए। इसलिए उसने अपनी शंका के समाधान के लिए बहुत सारे प्रश्न पूछे।
स्वामी विवेकानंद ने प्रत्येक प्रश्न का जवाब तो ठीक दिया ही, पर यह भी बता दिया कि वह प्रश्न पुस्तक के किस पृष्ठ पर है। तब ग्रंथपाल स्वामी जी की मेधा स्मरण शक्ति देखकर ग्रंथपाल आश्चर्यचकित हो गया। ऐसी स्मरण शक्ति का रहस्य पूछा। स्वामी विवेकानंद ने कहा - पढ़ने के लिए जरूरी है एकाग्रता और एकाग्रता के लिए जरूरी है ध्यान। ध्यान के द्वारा ही हम इंद्रियों पर संयम रख सकते हैं।
--- राधास्वामी जी !!

 



परोपकार की भावना व्यर्थ नही जाती
बूढ़ा थिआन जंगल में जहाँ रहता था वहाँ ज्यादा आबादी नहीं थी। बस दो-चार घर थे। पास एक बड़ा तालाब था जहाँ सर्दियों में कई तरह के पक्षी आते थे। इन पक्षियों को देखना थिआन को बहुत अच्छा लगता था। पिछले कई सालों में थिआन की सारस से अच्छी दोस्ती हो गई थी। थिआन आने वाले मेहमानों के भोजन का प्रबंध भी करके रखता ताकि उन्हें किसी तरह की तकलीफ ना हो। थिआन ने सोचा कि क्यों ना इस बार सारस के जाने के साथ शहर तक हो आऊँ और देखता आऊँ कि शहर में लोग एक-दूसरे के साथ किस तरह रहते हैं। जब सारस जाने को हुए तो थिआन भी उनके साथ घर से निकल पड़ा।
शहर पहुँचकर थिआन ने देखा कि वहाँ का नजारा बदल गया है। अब बहुत-सी नई इमारतें बन गई हैं और छोटी गलियाँ तो जैसे गायब ही हो गई हैं। थिआन को तभी एक भिखारी दिखाई दिया। थिआन ने उससे कहा- क्यों भाई, क्या तुम अपने कपड़े मुझसे बदलोगे? भिखारी इस बात पर चकित होकर पूछा- भला एक भिखारी के कपड़े लेकर वह क्या करेगा। थिआन ने बताया कि भिखारी के कपड़ों में उसे लोगों का व्यवहार परखने में आसानी होगी। भिखारी ने अपने फटे-पुराने कपड़े थिआन को दे दिए और थिआन के नए कपड़े लेकर चला गया। थिआन भिखारी बनकर शहर में घूमने लगा।
शहर में तीन दिनों तक घूमते-घूमते थिआन का बुरा हाल हो गया। इन तीन दिनों में उसे किसी ने कुछ नहीं दिया। थिआन के पास जो पैसे थे वह कपड़ों के साथ ही उसने भिखारी को दे दिए थे। शहर में घूमते थिआन पर किसी ने दया नहीं दिखाई। एक शाम गलियों में घूमते हुए भूखे थिआन की नजर कोने के एक रेस्तराँ पर पड़ी। थिआन ने जाकर रेस्तराँ के दरवाजे पर दस्तक दी। रेस्तराँ का मालिक बाहर आया। थिआन ने बताया कि वह पिछले तीन दिनों से भूखा है और उसके पास एक फूटा पैसा नहीं है।
रेस्तराँ मालिक थिआन को भीतर ले गया और भरपेट भोजन करवाया।
तीन दिनों बाद थिआन ने खाना खाया था। उसने रेस्तराँ मालिक को धन्यवाद दिया और अपनी राह ली। दूसरे दिन फिर से थिआन को किसी ने कुछ नहीं दिया। शाम को भूख सताने लगी और थिआन शाम को फिर से रेस्तराँ पहुँच गया। रेस्तराँ मालिक ने थिआन को दूसरे दिन भी अच्छे से भोजन कराया। तीसरी...चौथी और पाँचवीं शाम को भी ऐसा ही हुआ। और फिर तो यह हर रोज का नियम ही हो गया। थिआन ने इस तरह एक महीना उस रेस्तराँ में खाना खाते हुए बिताया। रेस्तराँ का मालिक कभी भी इस बात से परेशान नहीं हुआ कि कोई बिना पैसा चुकाए खाना खा रहा है बल्कि हर शाम वह थिआन का स्वागत करता।
एक दिन थिआन ने रेस्तराँ के मालिक से कहा कि कल मैं दूसरी जगह जा रहा हूँ पर तुमने इतने दिनों तक मेरी जो मदद की उसका मैं आभारी हूँ। मैं तुम्हें एक छोटा-सा उपहार देना चाहता हूँ। यह कहकर थिआन ने एक कागज पर तीन सारस का चित्र बनाया। इसके बाद थिआन ने ताली बजा-बजाकर एक गीत शुरू किया तो चित्र में दिखने वाले सारस नाचने लगे। यह आश्चर्यजनक दृश्य था। थिआन ने कहा कि इससे तुम्हारे रेस्तराँ में खूब लोग आएँगे और आमदनी भी अच्छी होगी। तुम बहुत दयालु हो और मुझे खुशी है कि तुम दूसरों के बारे में सोचते हो। रेस्तराँ मालिक बोला कि मैं आपके लिए और क्या कर सकता हूँ।
थिआन ने कहा कि अगर तुम मेरे लिए कुछ करना ही चाहते हो तो दूसरों की इसी तरह मदद करते रहना और यह व्यवहार दूसरों को भी सिखाना। यह कहकर थिआन ने विदा ली। इसके बाद रेस्तराँ मालिक के यहाँ तस्वीर में नाचते सारस देखने आने वालों की भीड़ बढ़ती गई। जल्दी ही रेस्तराँ मालिक शहर का अमीर व्यक्ति हो गया। बहुत अमीर हो जाने पर भी रेस्तराँ में थिआन की टेबल पर शाम को हमेशा खाना परोसा जाता रहा ताकि कोई भी जरूरतमंद आदमी किसी भी वक्त आए तो उसका स्वागत किया जा सके।
--- राधास्वामी जी !!

 



सहयोग ही जीवन है
भयानक जंगल में एक झोपड़ी थी उसमें एक संन्यासी रहता था, जो स्वभाव से बड़ा फक्कड़ था। जो भी मिल जाता उसी में संतोष कर लेता था।
एक बार रात्रि में बहुत जोर की वर्षा हुई। वह झोपड़ी का दरवाजा बंद कर सो रहा था। अचानक किसी ने द्वार खटखटाया। संन्यासी ने सोचा इस समय कौन आया है, कहीं कोई जंगली जानवर तो नहीं है।
ऐसे तूफान और मूसलाधार वर्षा में इस जंगल में कौन आ सकता है? वह उठा और दरवाजा खोलकर देखा - सामने एक मानव है। वर्षा से उसके कपड़े तरबतर हो रहे थे। ठंडी हवा का मारा काँप रहा था।
संन्यासी को देखते ही उसने कहा - महाराज! मैं रास्ता भूलकर इधर आ गया हूँ। वर्षा से बचने के लिए आसपास कोई स्थान नहीं है। विश्राम के लिए ठौर मिल जाए तो जीवन भर उपकार मानूँगा, सूर्योदय होने पर चला जाऊँगा।' संन्यासी ने आत्मीयता व्यक्त करते हुए कहा - 'चिंता मत करो। यह कुटिया तुम्हारी ही है, एक आदमी लेट सकता है, दो आदमी अच्छी तरह बैठ सकते हैं आओ हम दोनों सुखपूर्वक बैठेंगे।'
साधु ने बड़े प्रेम से उसको अंदर लिया। द्वार बंद कर दोनों आराम से बैठ गए। कुछ समय व्यतीत होने पर फिर दरवाजे पर थपकियाँ लगी। संन्यासी ने द्वार खोला। पूर्व की भाँ‍ति ही भीगता एक आदमी काँप रहा था।
उसने भी रात्रि-विश्राम के लिए निवेदन किया। संन्यासी ने कहा - 'प्रसन्नता से अंदर आ जाओ, इसमें अहसान की कोई बात नहीं है। संकट के समय किसी का भी सहयोग करना मानव का कर्तव्य है। इस कुटिया में आदमी लेट सकता है, दो बैठ सकते हैं। तीन आदमी का एक साथ रहना बड़ा सौभाग्य है। आओ अंदर हम तीनों खड़े रहेंगे।' तीनों अंदर खड़े हो गए कुछ समय पश्चात फिर द्वार को खटखटाने की आवाज आई। संन्यासी ने द्वार खोलकर देखा एक व्यक्ति पूर्ववत ही द्वार पर खड़ा ठिठुर रहा है।
संन्यासी ने कहा 'तुम अंदर आकर खड़े रहो। मैं बाहर खड़ा रहूँगा। तुम बहुत देर से ठिठुरते रहे हो, अब मैं ठिठुरन का अनुभव करूँगा। अंदर तीन से अधिक मनुष्य खड़े नहीं रह सकते।'
संन्यासी ने उस व्यक्ति को अंदर लिया और स्वयं झोपड़ी के बाहर खड़ा हो गया। वह रात भर सर्दी में खड़ा रहा, पर दूसरों के कष्ट निवारण में अद्‍भुत आनंद का अनुभव उसे हो रहा था। सहयोग मानव का कर्तव्य है। प्राय: मानव दूसरों से सहयोग तो चाहता है। पर दूसरों के लिए त्याग करना नहीं चाहता। उसे सदा स्मरण रखना चाहिए कि मानव समाज की नींव पारस्परिक सहयोग ही है।
--- राधास्वामी जी !!

 

 

शिष्य की लगन
यह कहानी है एक साधारण से व्यक्ति के झेनमेन की जो कि इतना सीधा था कि कोई भी उसे मारे तो वह पलटकर उन्हें कोई जवाब नहीं देता था। उसके इसी स्वभाव से सभी उसे मारते रहते, इस वजह से वह बेहद परेशान था। वह एक सुप्रसिद्ध कराटे गुरु के पास गया और कहा - क्या आप मुझे कराटे सिखाएँगे। उन्होंने कहा - मैं किसी भी ऐसे-वैसे व्यक्ति को कराटे नहीं सिखाता। वैसे भी झेनमेन बहुत ही गरीब परिवार से था। उन्होंने झेनमेन को कहा कि - मैं तुम्हें कराटे नहीं सिखा सकता। परंतु झेनमेन ने बहुत प्रार्थना की कि मुझे सीखना है। उसके बहुत कहने पर उन्होंने उसे अपने घर में पानी लाने का काम सौंपा और कहा कि इस काम को लगन से करना। वह काम लगन से करता था।
एक दिन वह पानी लेकर आ रहा था, कि पीछे गुरुजी ने उसे जोर का धक्का दिया और चले गए। उसने फिर से पानी भरा और पानी रखकर गुरुजी के पास गया और बोला कि गुरुजी मुझसे क्या गलती हो गई? जो आपने मुझे धक्का दिया। गुरुजी ने कहा - आगे से सावधान रहना। एक बार जब वह कपड़े सुखा रहा था तभी गुरुजी आए और उसको एक बाँस मार दिया। वह नीचे गिर गया फिर जल्दी-जल्दी अपना सारा काम किया। वह यह सब काम मन लगाकर करता था। फिर गुरुजी ने उसे रसोई घर का काम सौंप दिया।
वह रसोई घर में भोजन बनाने का काम करता था। उस समय भी जब वह भात बना रहा था। तभी गुरुजी आए और झेनमेन को उन्होंने जोर से धक्का दिया। तभी झेनमेन ने खुद को बचा लिया लेकिन उसके हाथों से भात का पात्र नीचे गिर गया। गुरुजी तो चले गए पर उसका एक और काम बढ़ गया। उसके बात वह सोता भी तो इतना सतर्क कि कोई मारे तो वह बच जाए।
एक बार जब वह रसोई घर की ओर जा रहा था तभी गुरुजी ने उसे एक जोरदार थप्पड़ मारना चाहा परंतु नहीं मार पाए क्योंकि झेनमेन ने हवा की सरसराहट से यह जान लिया कि कोई है और नीचे बैठ गया। अब वह हमेशा सतर्क रहता व अब सारे शिष्य कराटे सीखते तब वह सिर्फ बचने का तरीका सीखता था ताकि गुरुजी से बच सके। ऐसे ही एक साल पूरे हो गए। जब सभी शिष्यों को प्रमाण पत्र देने का समय आया तो सभी को प्रमाण पत्र मिले। उसके बाद देखा गया कि सबसे बड़ा योद्धा कौन है?
तो गुरुजी ने वहाँ झेनमेन को लाकर खड़ा कर दिया कि यह है सबसे बड़ा योद्धा। सब देखकर आश्चर्यचकित हो गए। सारे शिष्यों ने कहा - कि यह कैसे महान योद्धा है यह तो हमारे रसोई घर का नौकर है। तब गुरुजी ने दावा किया कि मेरे प्रिय शिष्यों इसको तुम आजमा सकते हो जिसने भी इसके शरीर को या किसी के भी शस्त्र ने अगर, इसको छू लिया तो समझो वही महान योद्धा है। सबने आजमाया पर सब हार गए।
--- राधास्वामी जी !!

 



ईश्वर की प्रार्थना
एक यहूदी पुजारी थे-रबी बर्डिक्टेव। लोग उन्हें अत्यंत श्रद्घा एवं भक्ति भाव से देखते थे। वहाँ मंदिर को सैनेगाग कहा जाता है। यहूदी पुजारी प्रतिदिन सुबह सैनेगाग जाते और दिनभर मंदिर में रहते। सुबह से ही लोग उनके पास प्रार्थना के लिए आने लगते। जब कुछ लोग इकट्ठे हो जाते, तब मंदिर में सामूहिक प्रार्थना होती। जब प्रार्थना संपन्न हो जाती, तब पुजारी लोगों को अपना उपदेश देते। उसी नगर में एक गाड़ीवान था। वह सुबह से शाम तक अपने काम में लगा रहता। इसी से उसकी रोजी-रोटी चलती।
यह सोचकर उसके मन में बहुत दुःख होता कि मैं हमेशा अपना पेट पालने के लिए काम-धंधे में लगा रहता हूँ, जबकि लोग मंदिर में जाते हैं और प्रार्थना करते हैं। मुझ जैसा पापी शायद ही कोई इस संसार में हो। यह सोचकर उसका मन आत्मग्लानि से भर जाता था। सोचते-सोचते कभी तो उसका मन और शरीर इतना शिथिल हो जाता कि वह अपना काम भी ठीक से नहीं कर पाता। इससे उसको दूसरों की झिड़कियाँ सुननी पड़तीं।
जब इस बात का बोझ उसके मन में बहुत अधिक बढ़ गया, तब उसने एक दिन यहूदी पुजारी के पास जाकर अपने मन की बात कहने का निश्चय किया। अतः वह रबी बर्डिक्टेव के पास पहुँचा और श्रद्घा से अभिवादन करते हुए बोला- "हे धर्मपिता! मैं सुबह से लेकर शाम तक एक गाँव से दूसरे गाँव गाड़ी चलाकर अपने परिवार का पेट पालने में व्यस्त रहता हूँ। मुझे इतना भी समय नहीं मिलता कि मैं ईश्वर के बारे में सोच सकूं। ऐसी स्थिति में मंदिर में आकर प्रार्थना करना तो बहुत दूर की बात है।"
पुजारी ने देखा कि गाड़ीवान की आंखों में एक भय और असहाय होने की भावना झाँक रही है। उसकी बात सुनकर पुजारी ने कहा-" तो इसमें दुःखी होने की क्या बात है?"
गाड़ीवान ने फिर से अभिवादन करते हुए कहा- "हे धर्मपिता! मैं इस बात से दुखी हूँ कि कहीं मृत्यु के बाद ईश्वर मुझे गंभीर दंड ने दे। स्वामी, मैं न तो कभी मंदिर आ पाया हूँ और लगता भी नहीं कि कभी आ पाऊँगा।"
गाड़ीवान ने दुःखी मन से कहा- "धर्मपिता! मैं आपसे यह पूछने आया हूँ कि क्या मैं अपना यह पेशा छोड़कर नियमित मंदिर में प्रार्थना के लिए आना आरंभ कर दूँ।" पुजारी ने गाड़ीवान की बात गंभीरता से सुनी। उन्होंने गाड़ीवान से पूछा- "अच्छा, तुम यह बताओ कि तुम गाड़ी में सुबह से शाम तक लोगों को एक गाँव से दूसरे गाँव तक पहुँचाते हो। क्या कभी ऐसे अवसर आए हैं कि तुम अपनी गाड़ी में बूढ़े, अपाहिजों और बच्चों को मुफ्त में एक गाँव से दूसरे गाँव तक ले गए हो?" गाड़ीवान ने तुरंत ही उत्तर दिया- "हाँ धर्मपिता! ऐसे अनेक अवसर आते हैं। यहां तक कि जब मुझे यह लगता है कि राहगीर पैदल चल पाने में असमर्थ है, तब मैं उसे अपनी गाड़ी में बिठा लेता हूँ।"
पुजारी गाड़ीवान की यह बात सुनकर अत्यंत उत्साहित हुए। उन्होंने गाड़ीवान से कहा - "तब तुम अपना पेशा बिलकुल मत छोड़ो। थके हुओं, बूढ़ों, अपाहिजों, रोगियों और बच्चों को कष्ट से राहत देना ही ईश्वर की सच्ची प्रार्थना है। जिनके मन में करुणा और सेवा की यह भावना रहती है, उनके लिए पृथ्वी का प्रत्येक कण मंदिर के समान होता है और उनके जीवन की प्रत्येक साँस में ईश्वर की प्रार्थना बसी रहती है।
मंदिर में तो वे लोग आते हैं, जो अपने कर्मों द्वारा ईश्वर की प्रार्थना नहीं कर पाते। तुम्हें मंदिर आने की बिलकुल जरूरत नहीं है। सच तो यह है कि सच्ची प्रार्थना तो तुम ही कर रहे हो।" यह सुनकर गाड़ीवान अभिभूत हो उठा। उसकी आंखों से आंसुओं की धारा बह चली। उसने पुजारी रबी बर्डिक्टेव का अभिवादन किया और काम पर लौट गया।
--- राधास्वामी जी !!

 



ईमानदारी ही सर्वश्रेष्ठ नीति
काम की तलाश में इधर-उधर धक्के खाने के बाद निराश होकर दीनू घर लौटने लगा। तो पीछे से एक आवाज आई। ऐ भाई! यहाँ कोई मजदूर मिलेगा क्या?' उसने पीछे मुड़कर देखा कि एक बूढ़ा तीन-तीन गठरियाँ उठाए खड़ा है। उसने कहा - हाँ! बोलो क्या काम है? मैं ही मजदूरी कर लूँगा।'
यह तीसरी गठरी जरा भारी है। तुम इसे उठा लो, मैं तुम्हें दो रुपए दूँगा।' दीनू ने कहा - 'ठीक है! चलो आप बूढ़े हैं। इतनी मदद तो मैं यूँ ही कर दूँगा।' इतना कहकर वह गठरी सिर पर रखकर चलने लगा। चलते-चलते दीनू ने बूढ़े से कहा - गठरी काफी भारी है, इसमें है क्या?'
बूढ़े ने धीरे से कहा - इसमें एक-एक रुपए के सिक्के हैं।' चलते-चलते दीनू ने देखा कि बूढ़ा उस पर नजर रखे है। उसने सोचा यह बूढ़ा सोच रहा होगा कि कहीं यह भाग नहीं जाए। पर मैं इतना बेइमान एवं लालची नहीं हूँ। मैं सिक्के के लालच में फँसकर बेइमानी नहीं करूँगा।
कुछ दूरी तय करने पर रास्ते में एक नदी पड़ी। दीनू ने देखा कि बूढ़ा थका हुआ है। उससे यह नदी पार नहीं होगी। उसने बूढ़े से कहा - 'बाबा आप थक चुके हैं। यदि आप ठीक समझें तो इन दो गठरियों में से एक और गठरी मुझे पकड़ा दें। मैं इसका बोझ आसानी से सह लूँगा।'
बूढ़े ने रुककर दीनू से कहा - 'ठीक है! लो पर तुम इसे लेकर कहीं भाग न जाना। इसमें चाँदी के सिक्के हैं।'
दीनू बोला - 'भला मैं क्यों भागूँगा? मैं आपको चोर, बेइमान दिखाई देता हूँ क्या? मैं धन के लालच में किसी को धोखा देने वाला नहीं हूँ।'
दीनू ने दूसरी गठरी उठाई और नदी पार कर ली। चाँदी के सिक्कों का लालच भी उसे डिगा नहीं पाया।
थोड़ी दूर चलने के बाद सामने एक पहाड़ी आ गई। बूढ़े ने फिर कहा - 'ए भाई! मैं तो ठीक से चल भी नहीं पा रहा हूँ।
ऊपर से कमर पर गठरी का बोझ और फिर पहाड़ी की चढ़ाई।'
दीनू बोला - लाइए बाबा यह गठरी भी मुझे दे दीजिए।'
बूढ़े ने कहा - 'कैसे दे दूँ?
इसमें तो सोने के सिक्के हैं। अगर तुम इसे लेकर भाग गए तो मैं बूढ़ा तुम्हारा पीछा भी नहीं कर सकूँगा।'
दीनू बोला - कहा ना, मैं ऐसा आदमी नहीं हूँ। ईमानदारी के चक्कर में ही मुझे मजदूरी करना पड़ रही है। वरना मैं एक सेठ के यहाँ मुनीम की नौकरी करता था। सेठ मुझे हिसाब में गड़बड़ करके लोगों को ठगने के लिए दबाव बनाता था। तब मैंने ऐसा करने से मना किया, तो उसने मुझे नौकरी से निकाल दिया।' तो फिर ठीक है। तीसरी गठरी भी तुम्हीं उठा लो, मैं धीरे-धीरे पहाड़ी चढ़ता हूँ।'
दीनू अब सोने की गठरी भी उठाकर चलने लगा। इस समय उसके दिमाग में आया कि यदि मैं तीनों गठरी लेकर भाग जाऊँ तो यह बूढ़ा मेरी पीछा भी न कर सकेगा और मैं एक झटके में मालामाल हो जाऊँगा। तब मेरी पत्नी भी खुश हो जाएगी। पैसा होगा तो इज्जत ऐशो आराम सभी कुछ मिलेगा। दिमाग में इतना आते ही उसके दिल में लालच आ गया और वह तीनों गठरियों को लेकर भाग खड़ा हुआ।
घर पहुँचकर उसने गठरियों को खोलकर देखा तो वह अपना सिर पीटकर रह गया। क्योंकि गठरियों में सिक्कों की आकृति के मिट्‍टी के ढेले थे।
वह सोच में पड़ गया कि बूढ़े ने ऐसा नाटक क्यों किया? तभी उसकी पत्नी को मिट्‍टी के सिक्कों में एक कागज मिला जिस पर लिखा था - 'यह नाटक इस राज्य के खजाने की सुरक्षा के लिए किया गया था। परीक्षा लेने वाला बूढ़ा कोई और नहीं स्वयं महाराज ही थे। तुम इस तरह नहीं भागते तो तुम्हें मंत्री पद मान-सम्मान सभी कुछ मिलता, कोई बात नहीं। अब दीनू को ईमानदारी की कीमत समझ आ गई थी।
--- राधास्वामी जी !!

 



बुद्धिमान वैद्य
पुराने जमाने की बात है एक सेठ था। सेठ जिद्दी और बदपरहेज था। जवानी में ही खाँसी ने उसे परेशान कर रखा था। घरेलू इलाज से खाँसी ठीक नहीं हुई। होती भी कैसे? खाँसी के लिए दही अच्‍छा नहीं होता लेकिन सेठ जी दही के बिना भोजन ही नहीं करते थे। इससे खाँसी बढ़ती ही जाती थी। सेठ बहुत धनवान था। इसलिए शहर के अच्छे-अच्‍छे डॉक्टर, वैद्य, हकीम सबको दिखाया गया किंतु सेठ की खाँसी ठीक नहीं हुई। ठीक न होने का कारण था 'दही'। सेठ जी को बहुत लोगों ने समझाया लेकिन सेठ जी के समझ में बात नहीं आई।
एक बहुत बुद्धिमान वैद्य थे, वे सेठ जी का इलाज करने के लिए तैयार हो गए। सेठ बोला - 'वैद्य जी! एक बात मेरी सुन लो, मैं दही खाना नहीं छोड़ूँगा वैद्य ने कहा - 'कौन कहता है आपसे दही छोड़ने को। आप एक समय दही खाते हैं तो दोनों समय दही खाना शुरू कर दीजिए। यदि दो समय दही खाते हों तो चार समय खाना शुरू कर दीजिए।'
सेठ खुश हुआ कि यह वैद्य तो बहुत अच्छा है। वैद्य ने सेठ को बताया कि दही खाने के तीन लाभ हैं सेठ ने बड़ी उत्सुकता से पूछा - 'वे कौन से लाभ हैं? वैद्य जी बोले सर्वप्रथम तो घर में चोरी नहीं होती, दूसरा कुत्ता भी नहीं काटता, तीसरा उसको बुढ़ापा कभी नहीं आता।' सेठ ने सुना, वैद्य जी की बातों पर गौर भी किया, किंतु उसको इस बात का सिर पैर नहीं मिला। आखिर हारकर सेठ जी ने वैद्य जी से पूछा - 'वैद्य जी बात मेरी समझ में नहीं आई। वैद्य ने कहा - 'देखो सेठ जी! दही खाते रहने से खाँसी ठीक नहीं होती। खाँसी होने से दिन-रात आदमी खाँसता ही रहता है। यदि वह खाँसता ही रहता है, तो चोर चोरी कैसे कर सकता है। सेठ ने कहा - 'यह बात तो आपकी ठीक है।' अब दूसरी बात भी समझाइए।'
दूसरी बात भी सीधी-सादी है। वैद्य जी बोले - 'आप अपने को ही देख लीजिए। जब से आपको खाँसी हुई है तब से आप बहुत कमजोर हो गए हैं और उसका फल यह है कि आपके हाथ में लाठी हमेशा रहती है। जहाँ जाते हो लाठी के साथ ही जाते हो। कुत्ता लाठी देखकर आपके पास फटकेगा भी नहीं, काटने की बात तो दूर की है।' दूसरी बात सुनकर सेठ जी चुप हो गए। सेठ जी को फिक्र होने लगी फिर भी बोले - 'तीसरी बात क्या है।'
तीसरी बात तो सेठ जी ऐसी है है अब तुम ही जानों कमजोर आदमी कितने दिन जी सकता है। खाँसी में दही खाने वाला मरीज तो जवानी भी पूरी नहीं काट सकता इसलिए बुढ़ापा उसके पास फटकेगा कैसे?' वैद्य जी बात समाप्त करके चुप हो गए।
उस दिन के बाद सेठ जी ने दही नहीं खाया। दही में उनको अपनी मौत दिखाई देती थी। सेठ जी ने मौत के डर से दही छोड़ा तो खाँसी ने भी उनका साथ छोड़ दिया।
--- राधास्वामी जी !!

 

 

 
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